हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय यौमे हज़रत अली असगर (अ) और माह-ए-मुहर्रम के मौके पर जिला बडगाम के मागाम क्षेत्र में धार्मिक श्रद्धा, मानव सेवा और शहीदाने कर्बला की याद में विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए गए। इस अवसर पर हज़रत इमाम हुसैन (अ), अहलेबैत (अ.) और विशेष रूप से हज़रत अली असगर (अ) की महान कुर्बानियों को श्रद्धांजलि दी गई। साथ ही इंसानियत की सेवा और कर्बला के संदेश को फैलाने के लिए ताबीर-ए-ख्वाब लाइब्रेरी मागाम की ओर से श्रीनगर-गुलमर्ग राष्ट्रीय मार्ग पर अज़ादारों, यात्रियों और आम राहगीरों के लिए एक विशेष सबील का भी आयोजन किया गया।
सबील पर पूरे दिन ठंडा पानी, शरबत और अन्य पेय पदार्थ बांटे गए ताकि मुहर्रम के पवित्र दिनों में शहीदाने कर्बला की प्यास और कुर्बानी को याद करते हुए लोगों की सेवा की जा सके। सबील का उद्घाटन प्रसिद्ध राजनीतिक और सामाजिक व्यक्ति शब्बीर अहमद मीर ने किया और औपचारिक रूप से पानी वितरण शुरू किया। इस अवसर पर सेवानिवृत्त शिक्षाविद गुलाम हसन बाबा, चेयरमैन ताबीर-ए-ख्वाब लाइब्रेरी गुलाम हसन रेशी, सामाजिक कार्यकर्ता, युवा स्वयंसेवक और स्थानीय गणमान्य लोग बड़ी संख्या में मौजूद थे।
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इस अवसर पर शब्बीर अहमद मीर ने कहा कि मुहर्रम केवल एक ऐतिहासिक घटना की याद नहीं है, बल्कि यह एक महान वैचारिक, आध्यात्मिक और नैतिक आंदोलन का नाम है, जो इंसान को हक, इंसाफ, कुर्बानी और सेवा का पाठ देता है। उन्होंने कहा कि कर्बला के मैदान में हज़रत इमाम हुसैन (अ) और उनके वफादार साथियों ने हक की बुलंदी के लिए जो कुर्बानियां दीं, वे हमेशा इंसानियत के लिए मार्गदर्शक रहेंगी।
उन्होंने कहा, “सबील का आयोजन दरअसल शहीदाने कर्बला की प्यास को याद करने और उनके संदेश को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का एक छोटा सा प्रयास है। लोगों को पानी पिलाना एक महान मानवीय सेवा है और यह हमें मोहब्बत, सहानुभूति और त्याग का सबक देता है।”
शब्बीर अहमद मीर ने आगे कहा कि आज के दौर में जब समाज कई सामाजिक और नैतिक चुनौतियों का सामना कर रहा है, कर्बला का संदेश हमें एकता, भाईचारा, सहिष्णुता और ज़ुल्म के खिलाफ डटे रहने की प्रेरणा देता है। उन्होंने युवाओं से आग्रह किया कि वे इमाम हुसैन (अ) की शिक्षाओं को अपने जीवन का हिस्सा बनाएं और समाज में सकारात्मक भूमिका निभाएं।
सेवानिवृत्त शिक्षाविद गुलाम हसन बाबा ने कहा कि मुहर्रम का संदेश किसी एक समुदाय, धर्म या क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरी इंसानियत के लिए है। उन्होंने कहा कि इमाम हुसैन (अ) की कुर्बानी हक और बातिल के बीच एक स्पष्ट रेखा खींचती है और इंसान को सिद्धांतों पर डटे रहने का साहस देती है।
उन्होंने कहा, “आज दुनिया को सबसे ज्यादा जरूरत शांति, सहनशीलता, नैतिक साहस और आपसी सम्मान की है, और ये सभी मूल्य हमें कर्बला की घटना से मिलते हैं। मुहर्रम हमें सिखाता है कि हक का रास्ता भले ही कठिन हो, लेकिन उस पर डटे रहना ही सच्ची सफलता है।”
इस बीच अंतरराष्ट्रीय हज़रत अली असगर (अ) दिवस के अवसर पर एक भावनात्मक मजलिस का भी आयोजन किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में माताओं ने अपने शिशु बच्चों के साथ भाग लिया। मजलिस में हज़रत अली असगर (अ.) की दर्दनाक शहादत को याद करते हुए सभी की आंखें नम हो गईं और प्रतिभागियों ने शहीदाने कर्बला को श्रद्धांजलि दी।
वक्ताओं ने अपने संबोधन में कहा कि हज़रत अली असगर (अ), जो इमाम हुसैन (अ) के छह महीने के मासूम पुत्र थे, ने कर्बला के मैदान में अपनी जान देकर कुर्बानी, सब्र और मजलूमियत की ऐसी मिसाल कायम की, जिसकी बराबरी इतिहास में कम ही मिलती है। उनकी शहादत आज भी इंसानियत के जमीर को झकझोरती है और ज़ुल्म के खिलाफ आवाज उठाने की प्रेरणा देती है।
उन्होंने कहा कि यौमे अली असगर (अ) वास्तव में इमाम हुसैन (अ) और हज़रत बीबी रबाब (अ) के महान सब्र और कुर्बानी को श्रद्धांजलि देने का दिन है। यह दिन दुनिया भर के लोगों को याद दिलाता है कि हक और इंसाफ के लिए दी गई कुर्बानियां कभी व्यर्थ नहीं जातीं।
कार्यक्रम के दौरान बच्चों ने भी शहीदाने कर्बला को श्रद्धांजलि दी। प्रतिभागियों ने हाल के दिनों में ईरान में शहीद हुए मासूम बच्चों को भी याद किया और उनकी तस्वीरें अपने हाथों में लेकर उनके परिवारों के साथ एकजुटता व्यक्त की। इस अवसर पर शहीद बच्चों के दर्जे की बुलंदी, इस्लामी दुनिया की एकता, उम्मत की भलाई और दुनिया भर में शांति व स्थिरता के लिए विशेष दुआएं की गईं।
चेयरमैन ताबीर-ए-ख्वाब लाइब्रेरी गुलाम हसन रेशी ने अपने संबोधन में कहा कि हज़रत अली असगर (अ) की शहादत कर्बला का अत्यंत दर्दनाक अध्याय है, जो आज भी दिलों को दुखी कर देता है। उन्होंने कहा कि अली असगर (अ) अपनी कम उम्र के बावजूद सब्र, कुर्बानी और हक की बुलंदी की एक महान मिसाल हैं।
उन्होंने आगे कहा कि कर्बला का संदेश आज भी इंसानियत को शांति, प्रेम, सहानुभूति, सहिष्णुता, इंसाफ और ज़ुल्म के खिलाफ डटे रहने का पाठ देता है। ऐसी सभाएं नई पीढ़ी को इस्लामी इतिहास, अहलेबैत की कुर्बानियों और मानवीय मूल्यों से परिचित कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
आयोजकों के अनुसार पूरे दिन अज़ादारों और सड़क से गुजरने वाले यात्रियों के लिए ठंडे पानी और अन्य पेय पदार्थों का वितरण जारी रहा। स्थानीय लोगों ने इस पहल की सराहना करते हुए कहा कि इस तरह की सामाजिक गतिविधियां न केवल धार्मिक मूल्यों को बढ़ावा देती हैं बल्कि समाज में सेवा भावना, भाईचारे और सामाजिक सद्भाव को भी मजबूत करती हैं।
कार्यक्रम के अंत में शहीदाने कर्बला, शहीदाने इस्लाम, पूरी मानवता की शांति, मुस्लिम उम्मत की एकता और जम्मू-कश्मीर की खुशहाली के लिए विशेष दुआएं की गईं, जबकि प्रतिभागियों ने “लब्बैक या हुसैन” और “लब्बैक या अली असगर” के नारों के साथ अपने भाव व्यक्त किए।
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